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जंगल, और स्वच्छ पर्यावरण बचाने एक अनूठी अलख गो-काष्ठ

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पृथ्वी पर प्राणी मात्र के अस्तित्व के आधार जंगल और स्वच्छ पर्यावरण को बचाने की एक अनूठी अलख जगी है। गो-काष्ठ, वहीं गोबर के आय परक होने से गो-शालाओं में बेसहारा, वृद्ध और अनुपयोगी गायों की पूछ-परख बढ़ गई है। शव दहन, होलिका दहन, औद्योगिक बायलर, होटल के तंदूर एवं अलाव आदि में लकड़ी का स्थान गो-काष्ठ लेने लगा है। गो-काष्ठ मेन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. योगेन्द्र कुमार सक्सेना ने बताया कि गो-काष्ठ के जलने से 24.80 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइन का उत्सर्जन कम होता है। नमी कम होने के कारण गो-काष्ठ जल्दी जल जाता है और आम की लकड़ी देर तक जलती रहती है। सामान्य लकड़ी से शव दहन को 8 से 9 घंटे लगते हैं, जबकि गो-काष्ठ से यह प्रक्रिया 4-5 घंटे में पूरी हो जाती है। सामान्य लकड़ी की खपत 4 से 5 क्विंटल के विरूद्ध गो-काष्ठ केवल ढ़ाई से 3 क्विंटल ही लगता है। हिन्दु मान्यता के अनुसार यह पवित्र होने के साथ सस्ता भी पड़ता है।      डॉ. सक्सेना की देख-रेख में बुधनी की वर्धमान इंडस्ट्रीज में केप्टिव पॉवर प्लांट में फेबरिक के निर्माण में ईंधन के रूप में गो-काष्ठ का प्रयोग हुआ। इससे 19 मेगावॉट की बिजली बनाई गई, जो बिल्कुल कोयले की तरह जली। गो-काष्ठ के उपयोग से 30 प्रतिशत प्रदूषण भी कम होता है। केप्टिव पॉवर प्लांट मं 135 टन प्रति घंटे क्षमता का बायलर है, जिससे अधिकतम 115 टन प्रति घंटे भाप का उत्पादन किया जाता है और 24 मेगावॉट के प्लांट में अधिकतम 19 मेगावॉट बिजली बनती है, जिसके लिये रोज 360 टन कोयला इस्तेमाल होता है। भोपाल में साढ़े 3 लाख क्विंटल गौ-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। इसमें से 80 हजार क्विंटल गो-काष्ठ होलिका दहन में उपयोग हुआ। गो-काष्ठ के एवज में लगभग 85 हजार पेड़ कटने से बचे हैं।  

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