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नारद मुनि के कहने पर चंद्रमा ने भगवान शिव की अराधना की. जिससे प्रसन्न हुए भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर स्थान दिया

 
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चंद्रमा नवग्रहों में एक है, जिसकी उत्पत्ति को लेकर पौराणिक ज्ञान विज्ञान से अलग मत रखता है. वैदिक साहित्य में चंद्रमा को सोम कहा गया है, जो मन का कारक है. अग्नि ,इंद्र ,सूर्य आदि देवों के समान ही सोम की स्तुति के मन्त्रों की रचना भी ऋषियों द्वारा की गई है.

आज हम आपको उसी चंद्रमा की उत्पत्ति के पौराणिक सिद्धांतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनमें चंद्रमा को ग्रह व देव दोनों माना गया है.

चंद्रमा की उत्पत्ति
चंद्रमा के बारे में मत्स्य, पद्म, अग्नि और स्कन्द पुराण में विस्तार से बतलाया गया है. मत्स्य पुराण में लिखा है कि जब सृष्टि के रचनाकार ब्रह्माजी ने मानस पुत्रों को प्रकट किया तो उनमें से एक पुत्र ब्रह्म ऋषि 'अत्रि' हुए. उनका विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री अनुसुइया से हुआ था. अनुसुइया पतिव्रता स्त्री थीं. जब त्रिदेवों ने अनुसुइया की परीक्षा ली तो उस समय दुर्वासा ऋषि, दत्तात्रेय व सोम का जन्म हुआ, वही सोम चंद्रमा हैं.
दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से चंद्रमा की विवाह
पुराणों के अनुसार चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था. ये कन्याएं रोहिणी, रेवती, कृतिका, मृगशिरा, आद्रा, पुनर्वसु, सुन्निता, पुष्य अश्व्लेशा, मेघा, स्वाति, चित्रा, फाल्गुनी, हस्ता, राधा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, अषाढ़, अभिजीत, श्रावण, सर्विष्ठ, सताभिषक, प्रोष्ठपदस, अश्वयुज और भरणी हैं

इन कन्याओं के नाम पर ही 27 नक्षत्र बताए गए हैं. कहा जाता है कि चंद्रमा जब 27 नक्षत्रों का चक्कर लगा लेता है, तब एक मास पूरा होता है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार चंद्रमा की उतरती और चढ़ती कलाओं से ही तिथियों व माह के कृष्ण व शुक्ल पक्षों का निर्धारण होता है. यहां तक की कुंडली भी चंद्रमा की दशा के अनुसार ही बनती है. जिस भाव में चंद्रमा होता है, उसी के अनुसार जातक की चंद्र राशि बनती है.

पत्नियों की वजह से लगा श्राप, भगवान शिव ने किया धारण
पौराणिक कथाओं में चंद्रमा के श्राप व भगवान शिव के मस्तक पर धारण (on his head) करने का भी जिक्र है. कथा के अनुसार चंद्रमा अपनी 27 पत्नियों में रोहिणी के प्रति ज्यादा आकर्षित थे. इससे अन्य पत्नियों ने नाराज होकर अपने पिता दक्ष प्रजापति से इसकी शिकायत कर दी. इस पर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दे दिया. इससे उनकी चमक फीकी पड़ गई.

बाद में नारद मुनि के कहने पर चंद्रमा ने भगवान शिव की अराधना की. जिससे प्रसन्न हुए भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर स्थान दिया. इससे चंद्रमा की शोभा फिर बढ़ गई. वहीं, समुद्र मंथन के समय के विष पान से भगवान शिव की बढ़ी गर्मी को भी इससे शीतलता मिली.

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