शिक्षा जगत का बड़ा फैसला 50 साल का इंतजार खत्म !
मप्र: अब दागी और अयोग्य छात्रों से वापस ली जा सकेगी डिग्री, विश्वविद्यालय अधिनियम के लंबित परिनियम 50 साल बाद हुए पारित
भोपाल | मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए एक ऐतिहासिक विधिक सुधार किया गया है। मध्य प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 लागू होने के लगभग 50 साल बाद, धारा 24 के तहत लंबित आवश्यक परिनियमों (Statutes) को आखिरकार शासन ने पारित कर दिया है। इससे विश्वविद्यालयों को अब नैतिक पतन या घोर कदाचार के दोषी व्यक्तियों से उनकी उपाधि (डिग्री) वापस (Withdraw) लेने का स्पष्ट कानूनी अधिकार मिल गया है।
क्या था मामला और कैसे मिली सफलता?
अधिनियम लागू होने के पांच दशक बाद भी डिग्री प्रत्याहृत (Withdraw) करने से जुड़े परिनियम नहीं बन पाए थे। इस वजह से विश्वविद्यालयों के सामने कानूनी और प्रशासनिक अस्पष्टता बनी रहती थी। इस गंभीर विधिक खामी को विदिशा के युवा अधिवक्ता रोहित सिंह चौहान ने प्रमुखता से उठाया। उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रपति शिकायत पोर्टल, सीएम हेल्पलाइन, प्रशासनिक सुधार विभाग और राज्यपाल कार्यालय तक लगातार शिकायतें दर्ज कराईं।
NHRC नई दिल्ली में दर्ज प्रकरण (Case No- 1951/12/8/2025) और लगातार आरटीआई (RTI) लगाने के बाद, उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालयों को इस पर संज्ञान लेना पड़ा।
समन्वय समिति की 102वीं बैठक में लगी मुहर
अधिवक्ता रोहित सिंह चौहान के निरंतर प्रयासों के बाद यह विषय शासन स्तर पर विचारार्थ पहुंचा। हाल ही में संपन्न हुई विश्वविद्यालय समन्वय समिति की 102वीं बैठक और स्थायी समिति में इस नए परिनियम (Statute 44) को सर्वसम्मति से पारित कर, मंत्रालय स्तर की आधिकारिक प्रक्रिया पूरी कर ली गई है।
नए परिनियम (Statute 44) की तीन बड़ी बातें:
डिग्री वापसी का आधार: यदि किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा नैतिक अधमता (moral turpitude) वाले किसी अपराध में दोषी ठहराया जाता है, या वह घोर कदाचार (gross misconduct) का दोषी पाया जाता है, तो विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद (Executive Council) उसकी डिग्री वापस ले सकेगी।
सुनवाई का मौका (प्राकृतिक न्याय): आरोपी व्यक्ति के खिलाफ तब तक कार्रवाई नहीं होगी, जब तक कि उसे अपना पक्ष रखने के लिए 'कारण बताओ नोटिस' (Show cause) न दिया जाए। कार्यपरिषद को बहुमत से प्रस्ताव पास करना होगा।
अपील का अधिकार: कार्यपरिषद के फैसले से असंतुष्ट होने पर 30 दिन के भीतर कुलाधिपति (Chancellor) के समक्ष अपील की जा सकेगी। इस मामले में उनका निर्णय अंतिम होगा।

'विकसित भारत 2047' के विजन से जुड़े हैं रोहित
अधिवक्ता रोहित सिंह चौहान लंबे समय से अपने गृह जिले विदिशा सहित प्रदेश के युवाओं को निःशुल्क करियर काउंसलिंग और कानूनी जागरूकता के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में यह विधिक सुधार "Viksit Bharat 2047" के विजन का ही एक हिस्सा है। शिक्षाविदों ने भी इस कदम को शिक्षा सुधार की दिशा में एक बड़ी और सार्थक पहल माना है, जिससे विश्वविद्यालयों का प्रशासनिक तंत्र और अधिक सुव्यवस्थित होगा।

